Sunday, May 10, 2026

वो कोना - क्या है अपना?

एक अपनी जगह की तलाश में
हम लोगों ने बना लिये हैं
अपने लिये एक-एक कोने।

भीड़ हो, तन्हाई हो,
ट्रेन हो या बस का सफ़र,
कार हो या प्लेन,
ये कोना साथ ही चलता है हमारे।

उंगलियां थिरकती हैं कोने पर,
और अपलक आंखें
उसे निहारती रहती हैं।

इस छोटे-से कोने में
सिमट आई है दुनिया
दोस्त, बाज़ार, प्रेम,
युद्ध, मनोरंजन,
ज्ञान, अफ़वाहें,
और अंतहीन शोर।

एक ही उंगली के सरकने भर से
हम पहुँच जाते हैं
किसी मलबे के नीचे दबे
रोते हुए बच्चे तक,
और अगले ही क्षण
कोई नाच रहा होता है
तेज़ संगीत पर,
कोई दिखा रहा होता है
अपनी सुबह की कॉफ़ी,
त्वचा की चमक,
या छुट्टियों की मुस्कान।

दुख और तमाशे के बीच
अब कोई दूरी नहीं बची।
हम ठहरते नहीं कहीं भी
न पूरी तरह दुख में,
न पूरी तरह खुशी में।

आंखें सब देखती हैं,
पर भीतर
कुछ कम महसूस होता है अब।

हर दृश्य को
अगले दृश्य ने धक्का दे दिया है।
हर भावना की उम्र
कुछ सेकेंड भर रह गयी है।

धैर्य भी अब
स्क्रीन की तरह
स्क्रोल होने लगा है।
लंबी बातें,
गहरी चुप्पियाँ,
धीरे-धीरे सोच पाना
सब कठिन होता जा रहा है।

पेड़ के नीचे बैठे हुए भी
हम पेड़ के साथ नहीं होते।
सूरज डूब रहा होता है सामने,
लेकिन हमारी निगाह
उसके रंगों पर नहीं,
उसकी स्टोरी पर होती है।

बारिश की आवाज़
धीरे-धीरे पीछे छूट गयी है,
पक्षियों की पुकार
नोटिफिकेशन में दब गयी है।

अब हम
नदी को कम,
उसकी तस्वीर को ज़्यादा देखते हैं।
पहाड़ पर खड़े होकर भी
पूरा आकाश नहीं देखते
बस उतना,
जितना स्क्रीन में समा सके।

हम साथ बैठे होते हैं,
पर अपने-अपने कोनों में।
कमरों में खामोशी होती है,
लेकिन उंगलियां लगातार बोलती रहती हैं।

यह कोना
सिर्फ सहारा नहीं रहा अब,
धीरे-धीरे
एक आदत,
फिर लत,
और शायद
एक अदृश्य दीवार बन गया है

जिसके उस पार
दुनिया लगातार जलती रहती है,
और इस पार
हम
स्क्रीन की रोशनी में
थोड़ा-थोड़ा
सुन्न होते रहते हैं।

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