तेजपुर यूनिवर्सिटी में चल रहे आंदोलन के फल स्वरूप एक ऐसी open space बनाने का सुझाव आ रहा है जो इस आंदोलन की true spirit को capture कर सके। ऐसी एक जगह का नाम भी ऐसा होना चाइये जो इस आंदोलन की छाप व सोच को दर्शाता हो। "
"मुक्त कंठ: तेजपुर यूनिवर्सिटी चर्चा केन्द्र"
जुबीन गर्ग की असमय मृत्यु के बाद शुरु हुए इस आंदोलन की एक मांग शहीद बेदी का निर्माण भी है। इस ओपन स्पेस में मुक्त बातचीत करने की जगह के साथ-साथ शहीद बेदी व जुबीन-स्मारक भी होंगे। यह जगह किसी पारंपरिक स्मारक या “कैंपस-प्लाज़ा” जैसी नहीं होगी। हम इसे मिलकर बनाएंगे, संवारेंगे। यह आंदोलन की देह होगी: खुली, अधूरी, बोलती हुई। ऐसा हो कि अगर कोई वहाँ पहली बार पहुँचे, तो उसे यह बनी हुई नहीं बल्कि बनती हुई, उभरती हुई जगह लगे।
खुलापन ही इसका Architecture होगा
कोई चारदीवारी नहीं
चारों तरफ़ खुला मैदान,
जिसमें कोई पक्की छत नहीं,
ऊपर हल्के टीन शेड, थोड़े असमान,
हम लोगों के द्वारा खुद अपने हाथों से लगाये गये,
कोई साइड वॉल नहीं
हवा, आवाज़ और बहस को रोकने के लिए कुछ भी नहीं
यह जगह कहेगी: यहाँ कोई gatekeeper नहीं है
कुर्सियों की औपचारिक कतारें नहीं
गोल या अर्ध-गोल आकार में रखे पत्थर, लकड़ी के ठूंठ, या सीमेंट के low platforms
बीच में खुला स्थान जहाँ कोई भी खड़ा होकर बोल सके
कोई मंच ऊँचा नहीं होगा;
सब बराबर ऊँचाई पर
यह संकेत होगा कि
यहाँ कोई “speaker” और “audience” नहीं, सिर्फ़ साझा आवाज़ें हैं
शहीद बेदी भी होगी
लेकिन मौन में नहीं
कोने में अलग-थलग नहीं
चर्चा-स्थल के बीच या किनारे से जुड़ी हुई
कोई भव्य मूर्ति नहीं,
साधारण पत्थर या धातु की संरचना
उस पर नाम, तारीख़ें नहीं, बल्कि एक पंक्ति:
“यह स्थान असहमति से बना है।”
लोग वहाँ फूल चढ़ाने से ज़्यादा बैठकर बात करेंगे
जुबीन - एक आवाज़ जो गूँजती रहती है
जुबीन गर्ग का स्मारक किसी मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि अनुभूति के रूप में होगा।
एक खुला कोना जहाँ उनके गीतों की पंक्तियाँ पत्थरों पर उकेरी हों
पीले बांस व अन्य पेड़ों के झुरमुट के बीच
फूलों की क्यारियां हों, पंक्षी हों, और दूसरे जीव भी मेहमान बनें
कभी कोई गिटार या ढोलक उठा ले
कोई तय समय नहीं, कोई कार्यक्रम नहीं
बस जब मन हो, तब गाना, याद करना, बोलना
यह बताएगा कि जुबीन स्मृति नहीं, संवेदना हैं, एक मुक्त कंठ हैं।
“We The People” की छाप कहीं कोई सरकारी plaque नहीं होगा
दीवार की जगह एक खुला notice-frame जिस पर हाथ से लिखे पोस्टर, पर्चे, कविताएँ
एक छोटा सा संकेत: “Funded, Built, Inaugurated and Maintained by We The People”
बिना लोगो, बिना चमक
यह जगह गर्व नहीं जताएगी
यह जिम्मेदारी याद दिलाएगी
रात में
कोई floodlight नहीं बस हल्की रोशनी
आवाज़ें कम, लेकिन गंभीर
चर्चा धीमी, पर गहरी
ऐसा लगेगा जैसे
कैंपस की आत्मा यहाँ बैठकर साँस ले रही हो।
यह जगह सुंदर भी होगी
और सच भी
यह अधूरी लगेगी,
क्योंकि आंदोलन कभी पूरा नहीं होता
और जो भी वहाँ बैठेगा, उसे लगेगा
यह जगह मुझसे बनी है,
मुझसे ही आगे बढ़ेगी,
और मुझे ही इसे बनाना है, हर मायनों में।
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